
बच्चे यदि पल भर के लिए भी मां से जुदा हो जाते हैं, तो वह व्याकुल हो जाती है। बच्चे पर थोडा सा कष्ट भी उनके लिए चिंता का कारण बन जाता है।
बच्चा खेल-खेल में भले ही मां को भूल जाए, मां उसकी पल-पल की सुध लेती रहती है। भगवान भी अपने सच्चे भक्त को एक पल के लिए भी नहीं भूलते हैं।
भगवान के संदेशवाहक
हीरा अपने आप में बहुमूल्य है, पूर्ण है। लेकिन वह तब तक अधूरा है, जब तक हीरे का पारखी न केवल उसकी तारीफ करे, बल्कि उसे अपनी आंखों में भी बसाए। ठीक उसी तरह, भक्त ही हैं, जो भगवान के गुणों का बखान करते हैं और उनके संदेश को प्रवचन के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाते हैं। कहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु ने अपनी सच्ची भक्ति से प्रभु का दर्शन पा लिया था। इसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन श्रीकृष्ण के संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए समर्पित कर दिया।
भक्त की सच्ची पुकार
हर गुरु को एक अच्छे शिष्य की तलाश होती है। वह चाहे संगीत हो, कला हो या फिर आध्यात्म। हर गुरु चाहते हैं कि जो ज्ञान उन्होंने अथक प्रयास और श्रम के बाद प्राप्त किया है, उसे किसी योग्य शिष्य को देकर ही इस संसार को छोडें। बिना योग्य शिष्य के गुरु स्वयं को अधूरा महसूस करते हैं। यदि उन्हें योग्य शिष्य मिल जाता है, तो उन्हें ऐसा लगता है, जैसे उनका जीवन सफल हो गया है। एक अच्छे शिष्य की खोज ही उनकी गुरु दक्षिणा बन जाती है। शिष्य को सारी शिक्षा-दीक्षा देकर वे स्वयं को भारहीन महसूस करते हैं। ठीक उसी तरह भगवान की नजर में भक्त एवं उसकी भक्ति का सर्वोच्च स्थान है। सच्चे भक्त उन्हें जान से ज्यादा प्यारे होते हैं। सच तो यह है कि भगवान किसी मोह-माया या किसी प्रकार के प्रलोभन या स्तुति आदि से प्रसन्न नहीं होते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार के छल या बल से नहीं जीता जा सकता है।
भक्त की सच्ची पुकार के आगे वे स्वयं को असहाय पाते हैं और व्याकुल होकर उनके पास दौडे चले आते हैं। जहां बडी-बडी शक्तियां हार जाती हैं, वहीं भक्त की निर्मल भक्ति भगवान के दिल को पिघला देती है और उन्हें अपना बना लेती है।
भक्ति की मिठास
भगवान मनोवांछित वर देने से पहले भक्त की खूब परीक्षा लेते हैं। उसे सोने की तरह आग से तपाकर देखते हैं, तब कहीं जाकर उसे अपना भक्त स्वीकार करते हैं। भगवान खुद मानते हैं कि भक्त होना सौभाग्य की बात है, क्योंकि भगवान कोई भी काम स्वयं इस धरती पर आकर नहीं करते हैं। कहते हैं कि संसार का उद्धार करने के लिए भगवान को मनुष्य योनि में जन्म लेना पडता है। तभी तो भगवान राम और श्रीकृष्ण ने मनुष्य का अवतार लिया और मनुष्य बनकर इस संसार का उद्धार किया। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं
यदा-यदा ही धर्मस्य:,ग्लानिर्भवतिभारत:।
अभ्युत्थानमअधर्मस्य,तदात्मानमसृजाम्यहम:।।
अर्थात् जब-जब इस धरती पर धर्म की हानि होगी, तब-तब मैं जन्म लूंगा।
यदि आज पृथ्वी पर मानव-धर्म का पालन होता है, तो वह भी भक्त और उसकी भक्ति के कारण। भक्त है, तो भक्ति है, भक्ति है, तो भगवान है। वैसे, यह सारा खेल, यह सारा स्वांग स्वयं परमात्मा ने ही रचा है। सच तो यह है कि भक्त में ही भगवान के गुण आ जाते हैं और वह उनका रूप बन जाता है। इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। चीनी, गुड, गन्ना और मिठाई-इन सबका एक ही स्वाद होता है। इन सबके अंदर एक ही रूप है और वह है मिठास। हम मिठास को देख नहीं सकते, महसूस कर सकते हैं। लेकिन गुड, चीनी, गन्ना और मिठाई यह सब उस मिठास का रूप है, जिसे हम देख सकते हैं, दिखा सकते हैं। मिठास, यानी भगवान के गुणों से परिचित होना है, तो मिठाई अर्थात भक्त होना ही पडेगा। इसीलिए मिठास को अपने वजूद के लिए मिठाई का रूप लेना ही पडता है। ठीक इसी तरह भगवान को भक्त के भक्ति की मिठास लेनी है, तो उन्हें उनका आसरा लेना पडता है।